बिजली, पानी, खाद, गैस. गरीबी. महंगाई, डीजल-पेटोल, बेरोजगारी, उद्योग, कषि, शिक्षा सब हाशिये पर गये। आज अचानक ये सारे शब्द नेताओं की जबान से यं उड गये जैसे तेज आंधी में गरीब का छप्पर उड जाता हैपांच साल जिन समस्याओं का ढिंढोरा पीटा गया. आज उन पर भयानक चप्पी हैचुप्पी के ऊपर चाहे शक के बादल मंडरा रहे हों पर एक नया शब्द जन-जन के अधरों पर चिपक गया है और वह है सर्जिकल स्ट्राइक। _ 'स्ट्राइक' का अर्थ तो अपने यहां सब जानते हैं क्योंकि हडताल करने में तो हम अव्वल हैंपर 'सर्जिकल' का मतलब सबको नहीं पता। आज ऐरा- गैरा भी इन दोनों शब्दों को इतने अधिकार भाव से बोलने लगा है जैसे कि इस ऑप्रेशन में उसने भी तीर चलाये होंसर्जिकल स्टाइक की हिन्दी भी जल्दी से सझती नहीं है ।गगल बाबा से पछा तो जवाब मिला- शल्य हडतालवायसेना ने जो पराक्रम किया है. उसका शल्य हडताल से कछ नाता नहीं जड रहा। पर विरोधी नेता वायसेना के साहस की शल्य चिकित्सा यानी चीरफाड करने में दिन-रात जटे हैं। 56 इंच के सीने और सेना के चौडे कन्धों ने मिलकर आतंकियों की चीरफाड़ ही नहीं बल्कि जो सफाया किया है. उसे देखकर बड़े-बड़े सर्जन भी दांतों तले अंगुलियां दबा रहे हैं। पाकिस्तान तो लड़ाई से बचने के उपाय ढूंढ़ रहा है और अपने यहां विरोधी सर्जिकल स्ट्राइक के मुद्दे पर ही लड़ने-मरने को उतारू हो रहे हैं। कहावत है कि एक नदी अपनी ताकत से चट्टानों को नहीं काटती बल्कि अपनी हठ से काटती है और लगातार कोशिश करते रहने से काटती है। बात में दम है। यदि बात को नेताओं के परिप्रेक्ष्य में देखें तो और भी दम है। नेतागण अपनी झूठी-सच्ची बात पर अटल रहते हैं और नदी की तरह विरोधी पार्टियों को काटते चलते हैं और जीत के ख्वाबों को सच का चोला पहनाने में सफल होते हैं ।पहले चुनावों की तूती बजती थी पर इस बार नगाड़ा बजा है। नगाड़ा भी ऐसा कि जिसकी आवाज़ में और कुछ सुनायी ही नहीं दे रहा है। आज से पहले आम आदमी का चुनावों से इतना सरोकार देखने को नहीं मिला, जितना इस बार है। नेता तो नेता और आमजन भी आगामी चुनावों में सर्जिकल स्ट्राइक जैसा 'मजा चखा देंगे' की माला जप रहे हैं ।एक बर की बात है अक नत्थू बोल्या- हां रै सुरजा! ये सारे हीरो-हीरोइन आजकल दो-दो तरहां की शादी क्यूं करें हैं ? अर फेर तीन- चार तरह की रिसेप्शन धर दे हैं
अपना डफला अपने राग